13 जिलों से पहुंचे हजारों कर्मचारी-शिक्षक, परेड ग्राउंड से मुख्यमंत्री आवास तक कूच; बैरिकेडिंग पर रोका गया मार्च
देहरादून, 14 सितंबर। बारिश के बीच रविवार को देहरादून की सड़कों पर सफेद टोपियों और NMOPS के झंडों के साथ कर्मचारी-शिक्षकों का बड़ा हुजूम दिखाई दिया। प्रदेश के सभी 13 जिलों से पहुंचे हजारों कर्मचारी, शिक्षक और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर प्रदेशव्यापी शक्ति प्रदर्शन किया। परेड ग्राउंड से मुख्यमंत्री आवास की ओर निकले पेंशन मार्च को पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग कर रोक दिया।
बारिश के बावजूद प्रदर्शनकारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। एक ओर कर्मचारी-शिक्षकों की बड़ी भीड़ और दूसरी ओर पुलिस का भारी बंदोबस्त व बैरिकेडिंग—देहरादून में आंदोलन की तस्वीर यही रही।

आखिर पुरानी पेंशन की मांग क्यों?
साधारण शब्दों में समझें तो विवाद सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा का है। पुरानी पेंशन व्यवस्था में पात्र कर्मचारियों को निर्धारित सरकारी नियमों के तहत सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन मिलती थी। इसके विपरीत NPS यानी National Pension System अंशदान और निवेश पर आधारित व्यवस्था है, जिसमें सेवानिवृत्ति का लाभ संचित पेंशन राशि और निवेश से मिलने वाले रिटर्न से जुड़ा होता है।
कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि जिसने अपने जीवन के कई दशक सरकार और विभाग की सेवा में लगा दिए, उसके लिए सेवानिवृत्ति के बाद निश्चित, सम्मानजनक और भरोसेमंद आर्थिक सुरक्षा होनी चाहिए। इसी आधार पर वे NPS के स्थान पर पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
उनके लिए यह केवल पेंशन व्यवस्था का तकनीकी सवाल नहीं, बल्कि बुढ़ापे की सुरक्षा और सम्मान का प्रश्न है।
बैरिकेडिंग के सामने सरकार को राजनीतिक संदेश
मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने रास्ते में रोक दिया। इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने अपनी मांगों और नारों के साथ प्रदर्शन जारी रखा।
आंदोलनकारियों ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कर्मचारियों की मांग पर समाधान नहीं निकला तो आने वाले समय में इसका असर उनके राजनीतिक रुख और मतदान पर भी पड़ सकता है।
प्रदर्शन से उठी सबसे स्पष्ट हुंकार थी—
“जो हित की बात करेगा, वही राज्य में राज करेगा।”


NMOPS के नेतृत्व में जुटे कर्मचारी-शिक्षक
आंदोलन National Movement for Old Pension Scheme (NMOPS) के नेतृत्व में हुआ। NMOPS उत्तराखंड के प्रांतीय अध्यक्ष जीतमणि पैन्यूली सहित संगठन के विभिन्न पदाधिकारी और जिलों के प्रतिनिधि इसमें शामिल रहे। देहरादून जिलाध्यक्ष संतोष गड़ोही सहित विभिन्न कर्मचारी एवं शिक्षक संगठनों के पदाधिकारियों ने भी भागीदारी की।
शिक्षक संघ (प्राथमिक) के अध्यक्ष धर्मेंद्र रावत सहित अन्य शिक्षक प्रतिनिधि भी आंदोलन में मौजूद रहे। प्रदेश के विभिन्न विभागों और संगठनों के कर्मचारी, शिक्षक, महिला प्रतिभागी तथा कर्मचारियों के परिजन भी प्रदर्शन में शामिल हुए।


मसूरी से भी पहुंचे कर्मचारी और शिक्षक
प्रदेशव्यापी आंदोलन में मसूरी से भी विभिन्न सरकारी विभागों के कर्मचारी, शिक्षक और प्रतिनिधि देहरादून पहुंचे। उन्होंने प्रदेश के अन्य जिलों से आए कर्मचारियों और शिक्षकों के साथ पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर अपनी आवाज बुलंद की।
मसूरी की भागीदारी ने यह भी रेखांकित किया कि पेंशन का सवाल केवल राजधानी या किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में सरकारी कर्मचारियों के बीच यह साझी चिंता और मांग बन चुका है।

TET का मुद्दा—शिक्षकों की अलग बड़ी चिंता
पुरानी पेंशन के अलावा शिक्षकों के बीच TET की अनिवार्यता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 13 सितंबर की NMOPS रैली का मुख्य मुद्दा पुरानी पेंशन की बहाली था, जबकि TET को लेकर शिक्षकों का अलग संघर्ष चल रहा है।
शिक्षकों का सवाल है कि जिनकी नियुक्ति के समय TET अनिवार्य नहीं था, उनसे वर्षों की सेवा के बाद इसे अनिवार्य किए जाने का क्या औचित्य है। इस मुद्दे ने लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के बीच भविष्य और सेवा की निरंतरता को लेकर चिंता बढ़ाई है।
इस तरह शिक्षक समुदाय के सामने आज दो अलग लेकिन गंभीर चिंताएं हैं—सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा और सेवा के दौरान बदलती पात्रता संबंधी शर्तें।




अब गेंद सरकार के पाले में
13 सितंबर का देहरादून प्रदर्शन केवल एक रैली नहीं रहा। यह उन हजारों सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों की सामूहिक आवाज के रूप में सामने आया, जो अपनी सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन को लेकर सरकार से स्पष्ट और सुरक्षित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
परेड ग्राउंड से मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने से पहले रोके गए इस मार्च ने सरकार के सामने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ दिया है—
क्या सरकार वर्षों से उठ रही पुरानी पेंशन की मांग का कोई नीतिगत समाधान निकालेगी, या यह मुद्दा आने वाले समय में और बड़े आंदोलन का रूप लेगा?
आंदोलनकारियों का संदेश फिलहाल साफ है—
