हिंदी दिवस पर चंद्रकुंवर बर्त्वाल को नमन: 28 वर्ष में चला गया कवि, पीछे छोड़ गया हिमालय जितना विराट साहित्य

79वीं पुण्यतिथि पर मसूरी में चंद्रकुंवर शोध संस्थान और द हिल्स ऑफ मसूरी का संयुक्त आयोजन; साहित्य व हिमालयी संस्कृति के संरक्षण पर जोर, प्रतिमा के सौंदर्यीकरण और वाचनालय की घोषणा

मसूरी। हिंदी दिवस पर जब देश अपनी भाषा और उसकी साहित्यिक विरासत को याद कर रहा है, मसूरी ने उसी दिन हिंदी के उस हिमवंत कवि को नमन किया, जिसने अपने बेहद छोटे जीवन में पहाड़, प्रकृति और मनुष्य के भीतर की संवेदनाओं को कविता की ऐसी भाषा दी, जो उनके जाने के दशकों बाद भी जीवित है।

हिमवंत कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल की 79वीं पुण्यतिथि पर मालरोड स्थित उनकी प्रतिमा पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। चंद्रकुंवर शोध संस्थान, मसूरी और द हिल्स ऑफ मसूरी के संयुक्त तत्वावधान में हुए कार्यक्रम में पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी सहित सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों और साहित्य प्रेमियों ने माल्यार्पण कर कवि को श्रद्धांजलि दी।

बर्त्वाल को याद करना केवल पुण्यतिथि मनाना नहीं, बल्कि उस कवि को फिर से समझना है, जिसने मात्र 28 वर्ष के जीवन में हिंदी साहित्य को एक विशिष्ट हिमालयी संवेदना दी।

28 वर्ष का जीवन, साहित्य की विराट विरासत

चंद्रकुंवर बर्त्वाल का जन्म 20 अगस्त 1919 को रुद्रप्रयाग के मालकोटी गांव में हुआ था और 14 सितंबर 1947 को मात्र 28 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

उनका साहित्यिक व्यक्तित्व मुख्यतः कविता, गीत और प्रकृति-काव्य के लिए जाना जाता है। उनकी रचनाओं में हिमालय केवल पहाड़ों का दृश्य नहीं, बल्कि प्रकृति, मनुष्य, स्मृति, प्रेम, पीड़ा और अकेलेपन से जुड़ा जीवंत अनुभव है।

उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों और रचनाओं में ‘नंदिनी’, ‘गीत माधवी’, ‘पयस्विनी’, ‘प्रणयिनी’, ‘जीतू’ और ‘कंकड़-पत्थर’ जैसे नाम शामिल हैं। ‘काफल पाक्कू’ सहित उनकी अनेक रचनाओं में पहाड़ और प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव दिखाई देता है।

बर्त्वाल के साहित्य पर आज भी शोध और पुनर्पाठ जारी है। उनकी तुलना कालिदास और पश्चिमी साहित्य के कीट्स से किस आधार पर की गई और हिंदी साहित्य में उनका वास्तविक स्थान क्या है, यह भी अध्ययन का विषय बना हुआ है।

1994 से बर्त्वाल के साहित्य को सहेजने का प्रयास

चंद्रकुंवर शोध संस्थान के अध्यक्ष शूरवीर सिंह भंडारी ने बताया कि संस्थान वर्ष 1994 से लगातार बर्त्वाल की कविताओं के विस्तार, प्रचार-प्रसार और उनके साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए काम कर रहा है।

उन्होंने कहा कि इस दौरान संस्थान ने लगातार संगोष्ठियां, सम्मेलन, निबंध प्रतियोगिताएं और छात्र-छात्राओं के बीच विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की हैं। इन आयोजनों में केवल भारतीय विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि विदेशों में अध्ययन कर रहे छात्र-छात्राओं ने भी समय-समय पर प्रतिभाग किया है।

भंडारी ने कहा कि बर्त्वाल ने मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में हिंदी साहित्य को समृद्ध करने का असाधारण कार्य किया। उनके उपलब्ध साहित्य को संजोने, उसका संवर्धन करने और उसे संरक्षित रखने के लिए संस्थान के प्रयास लगातार जारी हैं। इस कार्य में द हिल्स ऑफ मसूरी भी सहयोगी के रूप में जुड़ा है।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में बर्त्वाल के कविता संसार के विश्लेषणात्मक अध्ययन, हिंदी साहित्य में छायावाद, तथा हिंदी साहित्य में चंद्रकुंवर बर्त्वाल के स्थान को लेकर एक स्मृति ग्रंथ तैयार किया जा रहा है।

भंडारी के अनुसार इस स्मृति ग्रंथ में इस प्रश्न पर भी विस्तार से विचार होगा कि चंद्रकुंवर बर्त्वाल को उत्तराखंड का कालिदास और पश्चिम का कीट्स क्यों कहा जाता है। इस विषय पर कई आलेख तैयार किए जा रहे हैं और स्मृति ग्रंथ का काम जारी है। इसे शीघ्र ही क्षेत्र के साहित्य प्रेमियों और पत्रकारों के बीच लाया जाएगा।

मीरा सकलानी ने की प्रतिमा के सौंदर्यीकरण और वाचनालय की घोषणा

मुख्य अतिथि पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी ने हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए चंद्रकुंवर बर्त्वाल को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों में रहते हुए बर्त्वाल ने जिस तरह की रचनाएं कीं, वह अपने आप में प्रेरणादायक है। उनके पास अपनी रचनाओं को प्रकाशित कराने तक के पर्याप्त साधन नहीं थे, इसके बावजूद उन्होंने पहाड़ की पीड़ा और संवेदनाओं को हिंदी साहित्य के सामने एक आईने की तरह रखा।

सकलानी ने कहा कि बर्त्वाल का साहित्य आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक संदेश है और हिंदी के प्रचार-प्रसार में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

उन्होंने हिंदी के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हिंदी के सम्मान और उसके प्रचार-प्रसार के लिए समाज को अपनी सोच में बदलाव लाने तथा सामूहिक रूप से योगदान देने की आवश्यकता है।

इसी अवसर पर पालिकाध्यक्ष ने मालरोड स्थित चंद्रकुंवर बर्त्वाल की प्रतिमा के सौंदर्यीकरण तथा वहां वाचनालय के निर्माण की घोषणा भी की।

किसी कवि की प्रतिमा उसकी स्मृति बचाती है, लेकिन वाचनालय उसकी आवाज को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है।

बर्त्वाल की सबसे बड़ी विरासत

शायद यही कि उन्होंने पहाड़ को केवल देखा नहीं—उसे महसूस किया और शब्द दिए।

उनकी कविता में प्रकृति पृष्ठभूमि नहीं बनती; वह स्वयं एक पात्र की तरह उपस्थित होती है। हिमालय उनके लिए सिर्फ भौगोलिक ऊंचाई नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उतरने वाली अनुभूति है।

एक कवि की उम्र 28 वर्ष हो सकती है, लेकिन उसकी कविता की उम्र नहीं होती।

आज हिंदी दिवस पर बर्त्वाल को याद करना केवल एक साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस हिंदी को याद करना है, जिसमें किसी क्षेत्र की मिट्टी, किसी पहाड़ की हवा और किसी मनुष्य का अकेलापन भी अपनी जगह पा सकता है।

मालरोड पर उनकी प्रतिमा के सामने चढ़े फूल कुछ समय बाद सूख जाएंगे। कार्यक्रम समाप्त होगा। लोग लौट जाएंगे।

लेकिन यदि कोई युवा आज पहली बार चंद्रकुंवर बर्त्वाल का नाम खोजे, उनकी कविता पढ़े और पहाड़ को उनकी आंखों से देखने की कोशिश करे—तो शायद यही उनकी 79वीं पुण्यतिथि और हिंदी दिवस की सबसे सार्थक श्रद्धांजलि होगी।

क्योंकि साहित्यकार स्मारकों में नहीं, पढ़े जाने पर जीवित रहते हैं।

कार्यक्रम में मौजूद रहे

कार्यक्रम में चंद्रकुंवर शोध संस्थान के अध्यक्ष शूरवीर सिंह भंडारी, सचिव नरेंद्र सिंह पडियार, पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी, पूर्व पालिकाध्यक्ष अनुज गुप्ता, हिमालयन साहसिक संस्थान के निदेशक एस.पी. चमोली, सभासद जसबीर कौर, शहर कांग्रेस अध्यक्ष अमित गुप्ता, सभासद पंकज खत्री, नीरज अग्रवाल, देवी गोदियाल, गंभीर पंवार, तनमीत खालसा, नरेश मल्ल, गौरव गुप्ता और वीरेंद्र कैतुरा सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी मौजूद रहे।